भारत की वित्तीय व्यवस्था
वित्तीय व्यवस्था का संबंध उन सभी से है, जो पैसे जुटाते है और जहां पैसे की मांग हो वहां पूर्ति करते है । लेन देन करने या उद्योग धंधे शुरू करने के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है ।
वित्तीय व्यवस्था के बचतकर्ता एवं निवेशकर्ता दो प्रमुख घटक होते है । बचतकर्ता वह व्यक्ति होता है ,जो अपनी आय का कुछ हिस्सा खर्च करने के बाद बचा लेता है और बचे हुए राशि को निवेश करना चाहते है ।
जबकि निवेशकर्ता वह व्यक्ति होता है ,जिसे उद्योग धंधे शुरू करने हेतु पैसे की आवश्यकता होती है ।
बचतकर्ता एवं निवेशकर्ता दोनों जहां पर अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करते हैं उसे वित्तीय बाजार कहते हैं।
वित्तीय बाजार को मुख्य रूप से दो भागों में बांट सकते हैं- 1. मुद्रा बाजार 2. पूंजी बाजार।
मुद्रा बाजार
मुद्रा बाजार में अल्पकालिक अवधि के लिए निवेश किया जाता है ।यह समय अवधि एक दिन से लेकर एक साल तक होता है इसके अंतर्गत सभी बैंक आते हैं । इन सभी बैंक को रिजर्व बैंक के द्वारा नियंत्रित एवं विनियमित किया जाता है।
इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न है-
- इसमें अल्पावधि के लिए निवेश किया जा सकता है।
- निवेश में जोखिम कम होता है।
- इसमें मिलने वाला ब्याज दर कम होता है।
- असंगठित क्षेत्र - इसके अंतर्गत देशी बैंकर,साहूकार एवं महाजन आते है , जो पैसे की जरूरत को पूरा करते है ।इनका प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा दिखता है , जहां बैंक नहीं होते है ।
- संगठित क्षेत्र - संगठित क्षेत्र के अंतर्गत पंजीकृत सभी सरकारी , निजी बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थान आते है।

